अस्पतालों के दावों के जल्द निपटारे के लिए ऑडिटर्स की संख्या बढ़ाई गई; अब आधार e-KYC के बिना नहीं बनेगा कार्ड
नई दिल्ली: केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी आयुष्मान भारत योजना को अधिक पारदर्शी और प्रभावी बनाने के लिए बड़े प्रशासनिक और तकनीकी बदलाव किए गए हैं। ‘स्टेट एजेंसी फॉर कॉम्प्रहेंसिव हेल्थ एंड इंटीग्रेटेड सर्विसेज’ (SACHIS) अब आयुष्मान योजना से जुड़े अस्पतालों के बकाया भुगतानों को ३० दिनों के भीतर निपटाने का प्रयास कर रही है। भुगतानों में होने वाली देरी को कम करने के लिए मेडिकल ऑडिटर्स की संख्या ४० से बढ़ाकर १३० कर दी गई है, साथ ही अन्य सहायक डॉक्टरों की संख्या में भी बढ़ोतरी की गई है। मुख्य कार्यपालक अधिकारी अर्चना वर्मा के अनुसार, हर महीने लगभग २ लाख भुगतान दावे प्राप्त होते हैं, जिन्हें समय सीमा के भीतर पूरा करने के निर्देश दिए गए हैं।
योजना की सुरक्षा और पारदर्शिता बढ़ाने के लिए अब आयुष्मान कार्ड बनवाने की प्रक्रिया में ‘आधार e-KYC’ को अनिवार्य कर दिया गया है। राष्ट्रीय स्वास्थ्य प्राधिकरण (NHA) ने ‘बेनिफिशरी आइडेंटिफिकेशन सिस्टम’ लागू किया है, जिसके तहत ई-केवाईसी के बिना कार्ड जारी नहीं किए जाएंगे। इसके अलावा, कार्ड में नए सदस्यों को जोड़ने के नियमों को भी सख्त किया गया है; अब केवल २०११ की जनगणना (SECC) सूची में शामिल पात्र परिवारों के बचे हुए सदस्यों को ही जोड़ा जा सकेगा। संदिग्ध और फर्जी कार्डों की पहचान के लिए अब कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) और ऑटोमेटेड सॉफ्टवेयर जैसी आधुनिक तकनीक का सहारा लिया जा रहा है, जो स्वचालित रूप से गलत कार्डों को ब्लॉक कर देती है।
एजेंसी द्वारा की गई इस सख्त निगरानी का असर भी दिखने लगा है। पिछले साल जनवरी में जहां १० लाख दावे लंबित थे, वहीं इस साल यह संख्या घटकर केवल ३ लाख रह गई है। दिसंबर २०२५ तक लगभग ४००० करोड़ रुपये का भुगतान अस्पतालों को किया जा चुका है। संदिग्ध कार्डों की पहचान होने पर उनका इलाज तुरंत रोक दिया जाता है और विस्तृत जांच के बाद ही उन्हें पुन: सक्रिय किया जाता है। यदि कार्ड गलत पाया जाता है, तो संबंधित व्यक्ति के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई का प्रावधान भी किया गया है, ताकि योजना का लाभ केवल वास्तविक जरूरतमंदों तक ही पहुँच सके।